Thursday, 16 March 2017

यूपी में भगवा सलाम









भाजपा ने यूपी में कमल खिला दिया है। भाजपा ने प्रचंड बहुमत हासिल किया है। करीब चालीस साल बाद कोई पार्टी यूपी में ऐसी विशाल बहुमत हासिल करने में कामयाब रही है। भाजपा ने अपने दम पर 312 सीटें हासिल की, और जनता दल से गठबंधन के बाद सीटों की संख्या 325 पहुंच गई। सपा और कांग्रेस के गठबंधन को 54, बसपा को 19 और अन्य को 18 सीटें मिली।





सपा, कांग्रेस और बसपा को इससे ज्यादा सीटें तो एग्जिट पोल में ही मिल रही थी। टुडेज चाणक्य के एग्जिट पोल लगभग सटीक रहे। भाजपा को उसमे 285, सपा और कांग्रेस के गठबंधन को 88 और बसपा को 27 सीटों का अनुमान था।  कुछ जानकार तो यह भी कह रहे थे कि हाथी एग्जिट पोल्स को कुचल देगा। परिणाम आते ही मोदी लहर में सब उड़ गए। 



जानते हैं क्या रहे चुनाव के समीकरण-




बीजेपी

बीजेपी ने शुरू से ही चुनाव प्रचार में पूरी जान फूंक दी थी। पीएम मोदी ने गली-गली घूम चुनाव प्रचार करे। ताबड़तोड़ रैलियां की। नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दे जो बीजेपी को डुबा और बना सकते थे, उसमें लोगों ने विश्वास दिखाया। मोदी ने नोटबंदी में ऐसा दिखाया कि नोटबंदी से गरीबों और किसानों को कोई तकलीफ नहीं होगी। तकलीफ सिर्फ भ्रष्टाचारियों को होगी। वहीँ सर्जिकल स्ट्राइक पर भी लोगों का भरपूर समर्थन मोदी को मिला। गन्ना मूल्य में बढ़ोतरी और क़र्ज़ माफ़ी ने किसानों का ध्यान आकर्षित किया। उज्जवला योजना में फ्री सिलिंडर मिलने से बीजेपी को महिलाओं का भी भरपूर साथ मिला। अन्य मुद्दे भी बीजेपी के पक्ष में गए। दिल्ली और बिहार में ज़बरदस्त हार का बदला यहां पीएम मोदी ने पूरा कर लिया।





सपा और कांग्रेस गठबंधन

सपा में चली पिता-चाचा और बेटे की लड़ाई में सपा ने अपना ही नुकसान किया। सपा का परंपरागत वोटर उनका दामन छोड़ बीजेपी में चला गया। वहीं जल्दबाज़ी में सपा ने कांग्रेस से गठबंधन किया। राहुल गांधी और अखिलेश ने  हर चुनावी रैली में मोदी को घेरा। अपना कुछ नया कहा नहीं जिसकी वजह से वोटर सपा से दूर चला गया। कहीं कहीं लोग सपा की परिवारवाद की राजनीति से मुक्ति पाना चाहते थे। अगर अखिलेश अगले विधानसभा चुनाव में सच में इन सबसे खुद को अलग करना चाहते हैं तो शुन्य से शुरु करें। 




बसपा

मायावती का इतना बुरा समय शायद पहले कभी था। पार्टी मात्र 19 सीटों पर ही सिमट गई। बसपा टक्कर नहीं दे पायेगी यह पहले से ही लग रहा था। हाँ, हालत इतनी ख़राब होगी यह भी नहीं सोचा था। दलितों को सिर्फ वोट बैंक बनाकर चलने की रणनीति का हश्र बसपा झेल रही है। एक दलित के मुख्यमंत्री बनने से जो स्वाभिमान मिलना था वो दलितों को मिल गया था। अब उसके आगे क्या? सामाजिक बदलाव के लिए जहां बसपा को कोई बड़ा जनांदोलन चलाना चाहिए था वहां बसपा सिर्फ चुनाव दर चुनाव जीतने की रणनीति ही बनाती रही। जहां देश का प्रधानमंत्री गली-गली प्रचार कर रहा था, बसपा सुप्रीमों ने सालों से अपने वोटरों के बीच जाना ही छोड़ दिया है। जो हुआ वह होना ही था। मायावती ने उतनी रैली करना भी ज़रूरी नहीं समझा जितनी उन्हें करनी चाहिए थी। सारा समय उन्होंने मोदी और बीजेपी को कोसते हुए गुज़ारा। 








देवांग मैत्रे

Sunday, 26 February 2017

अहिंसा से बड़ी हिंसा

        








'मेरा देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है' यह नारा तो आप सबको याद होगा। 22 फरवरी को डीयू के रामजस कॉलेज में आइसा और एबीवीपी छात्र गुटों की इस जबरदस्त भिड़ंत ने इस जुमले की कमर तोड़ दी है। आइसा के शांत विरोध को दबाने के लिए एबीवीपी ने लात-घूंसों के प्रयोग किया। आइसा को विरोध करने की ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि एबीवीपी के हंगामे के बाद कॉलेज प्रशासन ने इस सेमिनार को कैंसिल कर दिया था। इसपर एबीवीपी का यह कहना था देश के गद्दारों को हम अपने कैंपस में बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। इस सेमिनार में जेएनयू की छात्रा शेहला राशिद और छात्र उमर खालिद को आना था।








बाद में जब आइसा और अन्य लेफ्ट समर्थित गुट, डीयू के छात्र व टीचर्स अपना शांत विरोध कर रहे थे वहीं एबीवीपी के मेंबर्स ने हंगामा कर दिया। 'भारत माता की जय' जैसे नारों के साथ एबीवीपी स्टूडेंट्स गद्दार, एंटी नैशनल जैसे शब्दों के साथ बवाल मचाते दिखे। वहीं दूसरी तरफ स्टूडेंट्स 'एबीवीपी कैंपस छोड़ो' के नारे लगा रहे थे। रामजस कॉलेज के छात्रों की यह राय थी कि हम सिर्फ यह कहना चाहते थे कि सबको बोलने की आजादी मिलनी चाहिए और सिर्फ एबीवीपी के हंगामे पर सेमिनार कैंसल करना गलत है, इसलिए हम पुलिस स्टेशन तक मार्च करने वाले थे। एबीवीपी छात्रों ने उनपर पत्थर फेंके, धमकाया।








एबीवीपी ने अहिंसक विरोध कर रहे छात्रों व टीचर्स पर पत्थरों व बोतलों से उनपर हमला किया। इस बीच पत्रकारों पर भी जमकर हमला साधा। छात्राओं व महिला पत्रकारों के साथ बदसलूकी की गई। चीज़ें छीनी गई। दिल्ली पुलिस ने विरोध कर रहे छात्रों को ही अपना शिकार बनाया। पत्रकारों को जमकर पीटा। इस हिंसक खेल में छात्रों, शिक्षकों व पत्रकारों को गंभीर चोटें आईं। कइयों को अस्पताल तक में भर्ती कराने की नौबत आयी है।








बोलने की आज़ादी को जिस तरह से यहां दबाया जा रहा है, यह दर्शाता है कि हमारे पास अब तथ्य नहीं हैं केवल मारपीट से ही हम जवाब देंगे। ऐसी सोच ही खतरनाक है और गलत है। डीयू ने देश दुनिया को कई शख्सियतें भी दी हैं। उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे विद्यार्थी भी अगर संकीर्ण मानसिकता का त्याग नहीं करेंगे तो औरों से अपेक्षा का करने का सवाल ही नहीं है। विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राएं अगर देश और समाज के विकास से जुड़े मुददों पर बहस न कर राजनीतिक मुददों मे उलझ जाएं कतई शोभाजनक नहीं है। किसी कार्यक्रम में किसकों अतिथि बनाया जाए, इसका निर्णय भी बौद्धिक स्वतंत्रता के आधार पर होना चाहिए। विश्वविद्यालय प्रबंधन और छात्र संगठन थोड़ी परिपक्वता के साथ ऐसे मामले सुलझाएं।





देवांग मैत्रे

Friday, 19 August 2016

विश्व फोटोग्राफी दिवस: जानिए भारत के टॉप 5 फोटोग्राफर्स के बारे में





आज पूरी दुनिया में विश्व फोटोग्राफी दिवस मनाया जा रहा है। अपने कैमरे में कई अद्भुत दृश्य कैद कर चुके भारतीय फोटोग्राफर ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। आइये जानते हैं भारत के 5 मशहूर फोटोग्राफर के बारे में-



रघु राय


मशहूर फोटोग्राफर व फोटो जर्नलिस्ट रघु राय का जन्म 1942 में झांग, ब्रिटिश इंडिया में हुआ था। रघु राय फ्रांस के एक प्रख्यात फोटोग्राफर हेनरी कार्तिएर ब्रेस्सन के शिष्य थे। रघु राय ने द स्टेट्समैन अखबार के लिए कुछ समय तक फोटोग्राफी की थी। उसके बाद राय फ्रीलांस फोटोग्राफर बने। इंडिया टुडे के लिए राय डायरेक्टर ऑफ़ फोटोग्राफी भी रहे। 1990-1997 तक दरमियान राय विश्व प्रेस फोटो के जूरी मेम्बर भी रहे थे। रघु राय ने अब तक अपने जीवन में 18 किताबें लिखी थी। 1972 में राय को पदमश्री और 1992 में अमेरिका में उन्हें पर्सन ऑफ़ द इयर पुरस्कार से भी नवाज़ा गया।




रघुबीर सिंह




मशहूर भारतीय फोटोग्राफर रघुबीर सिंह का जन्म 1942 में जयपुर में हुआ था। रघुबीर सिंह अपनी परिदृश्य और डाक्यूमेंट्री के तरीके की फोटोग्राफी के लिए काफी मशहूर थे। उन्होंने अपने करियर में नेशनल जियोग्राफिक मैगज़ीन, द न्यू यॉर्क टाइम्स और भी कई बड़ी-बड़ी कंपनी के लिए काम किया था। 70 के दशक के शुरू में रघुबीर ऐसे पहले फोटोग्राफर थे जिन्होंने अपने फोटो में रंग का उपयोग किया। उन्होंने अपने जीवन में 14 किताबें भी लिखी थी. वर्ष 1983 में रघुबीर सिंह को भारत सरकार की ओर से पदमश्री पुरस्कार से नवाज़ा गया था। वर्ष 1999 में रघुबीर सिंह पूरी दुनिया को अलविदा कह गये थे।




पाब्लो बार्थोलोम्यु



भारतीय फोटो जर्नलिस्ट और स्वतंत्र फोटोग्राफर पाब्लो बार्थोलोम्यु का जन्म 1955 में नई दिल्ली में हुआ था। पाब्लो ने अपने फोटोग्राफी के जीवन में जिंदगी के दूसरे पहलू के बारे में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई। पाब्लो ने सत्यजीत रे की फिल्म शतरंज के खिलाड़ी और रिचर्ड एटनबरो फिल्म गांधी के लिए फोटोग्राफी भी की थी। पाब्लो के द्वारा खीचे गए फोटो न्यू यॉर्क टाइम्स, न्यूज़वीक, टाइम्स आदि मैगजींस में छपे। पाब्लो ने भोपाल गैस ट्रेजेडी, इंदिरा गांधी की हत्या आदि घटनाओं को भी कवर किया था।  2003 में भारत सरकार ने पाब्लो को पदमश्री पुरस्कार से नवाज़ा था।




होमई व्यरावाल्ला



मशहूर भारतीय फोटो जर्नलिस्ट होमई व्यरावाल्ला का जन्म 1913 में गुजरात में हुआ था। होमई भारत की पहली महिला फोटो जर्नलिस्ट थी। होमई ने अपने फोटोग्राफी पत्रकारिता के दौरान कई मशहूर नेताओं की तस्वीरें ली थी। विश्व युद्ध 2 के दौरान बंबई (अब मुंबई) आधारित द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया मैगज़ीन की तरफ से होमई ने कई महत्वपूर्ण कार्य किये थे। वर्ष 2010 में मुंबई स्थित राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय के साथ मिलकर अलकाज़ी फाउंडेशन फॉर द आर्ट्स ने होमई को उनके काम के लिए पूर्वव्यापी दिया था। भारतीय फोटोग्राफी को उन्होंने अपना अहम योगदान दिया था। उनसे प्रेरणा लेकर कई महिलाएं इस क्षेत्र में आयीं।



बेनु सेन




मशहूर भारतीय फोटोग्राफर बेनु सेन का जन्म 1932 में कोलकाता में हुआ था। बेनु सेन फेडरेशन ऑफ़ इंडियन फोटोग्राफी के महासचिव और फोटोग्राफिक एसोसिएशन ऑफ़ दम दम के अध्यक्ष भी थे। बेनु सेन ने अपने जीवन में कई छात्रों को फोटोग्राफी के छेत्र में आने के लिए प्रेरित किया था। उन्होंने अपने जीवन में किताबें भी लिखी थी। वर्ष 2010 में पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से नवाज़ा था।




देवांग मैत्रे


Thursday, 4 August 2016

किशोर कुमार (जन्मदिन विशेष): पल पल दिल के पास






भारतीय सिनेमा के लोकप्रिय और चहेते गायक ‘आभास कुमार गांगुली’ उर्फ़ किशोर कुमार का आज जन्मदिन है। उन्होंने मध्य प्रदेश के खंडवा में 4 अगस्त 1929 को मध्यमवर्गीय बंगाली परिवार में अधिवक्ता कुंजी लाल गांगुली के घर जन्म लिया था। अपने भाई-बहनों में सबसे छोटे किशोर कुमार को देखकर कोई नहीं जनता था कि पूरी दुनिया में यह बच्चा अपनी आवाज के दम पर पहचाना जाएगा। अपने गाने के अनोखे अंदाज़ के चलते किशोर कुमार को सब हरफनमौला कहते थे। Kishore Kumar Biography in Hindi में जानते हैं कैसा रहा उनका जीवन।




Kishore Kumar Biography in Hindi में किशोर कुमार के बड़े भाई स्वर्गीय अभिनेता अशोक कुमार व अभिनेता अनूप कुमार बॉलीवुड में अपना स्थान बना चुके थे। अशोक कुमार चाहते थे कि किशोर भी अभिनय में खुद आजमायें। किशोर कुमार बचपन से ही गायकी के शौक़ीन थे पर उन्होंने संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी। किशोर कुमार कैरियर के शुरूआती दिनों में फिल्मों में मुख्य गायक बनने से पहले  ‘बॉम्बे टॉकीज’ के लिए एक कोरस गायक हुआ करते थे। किशोर कुमार की ‘युद्लिंग’ काफी मशहूर थी जिसकी प्रेरणा उन्होंने अपने भाई अनूप कुमार के ऑस्ट्रियन रिकार्ड्स से ली थी। किशोर कुमार 1970 से 1987 के बीच सबसे महंगे गायक हुआ करते थे। किशोर कुमार ने अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, जीतेन्द्र जैसे बड़े-बड़े दिग्गज कलाकारों के गानों में अपनी आवाज दी।



किशोर कुमार ने गायन के साथ-साथ अभिनय में किस्मत आजमाई। उन्होंने वर्ष 1951 मे फिल्म ‘आंदोलन’ में बतौर मुख्य अभिनेता अपने कैरियर की शुरुआत की, लेकिन यह फिल्म दर्शको को पसंद नहीं आई। वर्ष 1953 मे प्रदर्शित फिल्म ‘लड़की’ बतौर अभिनेता उनके कैरियर की पहली हिट फिल्म थी। इसके बाद भी एक अभिनेता के रूप में किशोर कुमार ने अपनी फिल्मो के जरिये दर्शको का भरपूर मनोरंजन किया। किशोर कुमार ने अपने भाइयों अशोक और अनूप के साथ 1958 में आई फिल्म ‘चलती का नाम गाड़ी’ में भी अभिनय किया था। Kishore Kumar Biography in Hindi में इस फिल्म में किशोर के गाये “बाबु समझो इशारे’ और ‘एक लड़की भीगी भागी सी’  आज भी लोगों की जुबान पर हैं।




किशोर कुमार को अपने करियर में वह दौर भी देखना पड़ा, जब उन्हें फिल्मों में काम ही नहीं मिल रहा था। तब वह स्टेज पर कार्यक्रम पेश करके अपना जीवन यापन करने को मजबूर थे। मुंबई में आयोजित ऐसे ही एक स्टेज कार्यक्रम के दौरान संगीतकार ओपी नैयर ने जब उनका गाना सुना, तो उन्होंने भावविभोर होकर कहा कि महान प्रतिभाएं तो अक्सर जन्म लेती रहती हैं, लेकिन किशोर कुमार जैसा पार्श्व गायक हजार वर्ष में केवल एक ही बार जन्म लेता है। उनके इस कथन का उनके साथ बैठी पार्श्वगायिका आशा भोंसले ने भी सर्मथन किया।




Kishore Kumar Biography in Hindi में1964 में आई फिल्म ‘दूर गगन की छांव में’ से फिल्म निर्देशन की दुनिया में किशोर कुमार ने कदम रखा और बाद में ‘हम दो डाकू’, ‘दूर का राही’, ‘बढ़ती का नाम दाढ़ी’, ‘शाबास डैडी’, ‘दूर वादियो मे कही’, ‘चलती का नाम जिंदगी’ और ‘ममता की छांव’ मे जैसी कई फिल्मों का निर्देशन भी किया और साथ ही साथ उन्होंने इन फिल्मो के गानों में अपनी आवाज़ भी दी।




1969 मे निर्माता निर्देशक शक्ति सामंत की फिल्म ‘आराधना’ के जरिये किशोर कुमार सुरों की दुनिया के बेताज बादशाह बने लेकिन दिलचस्प बात यह है कि फिल्म के निर्माण की शुरुआत के समय फिल्म के संगीतकार सचिन देव वर्मन चाहते थे सभी गाने किसी एक गायक से न गवाकर दो गायकों से गवाएं जाएं। बाद में सचिन देव वर्मन की बीमारी के कारण फिल्म आराधना में उनके पुत्र आरडी बर्मन ने संगीत दिया। ‘मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू’ और ‘रूप तेरा मस्ताना’ गाने किशोर कुमार ने गाये, जो बेहद पसंद किये गए। ‘रूप तेरा मस्ताना’ गाने के लिये किशोर कुमार को बतौर गायक पहला फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। Kishore Kumar Biography in Hindi में इसके साथ ही फिल्म आराधना के जरिये वह उन ऊंचाइयों पर पहुंच गए, जिसके लिए वह सपनों के शहर मुंबई आए थे।




एक दिलचस्प बात यह भी है कि किशोर कुमार ने अपने घर के बाहर ‘किशोर से सावधान’ का बोर्ड लगाया था। एक बार प्रोड्यूसर एच एस रवैल, किशोर कुमार के घर उनसे लिए हुए पैसे लौटाने गए तो किशोर कुमार ने पैसे ले लिए फिर जब रवैल साहब ने हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया तो किशोर कुमार ने उनका हाथ मुंह में दबोच कर कहा की ‘क्या आपने घर के बाहर लगा बोर्ड नहीं पढ़ा?




किशोर कुमार को अपनी गायकी के लिए 8 बार फिल्मफेयर पुरस्कार से भी नवाज़ा गया था। उन्होंने 600 से अधिक फिल्मो में अपनी आवाज़ दी। उन्होंने बंगला, मराठी, गुजराती, कन्नड, भोजपुरी और उडिया फिल्मों में भी अपनी दिलकश आवाज में गाने गाए। Kishore Kumar Biography in Hindi में उनकी मदहोश कर देने वाली गायकी का बड़ो से लेकर छोटे बच्चे तक हर कोई दीवाना था।



13 अक्टूबर 1987 को दिल का दौरा पड़ने से किशोर कुमार इस दुनिया से हमेशा के लिए चले गए। उनकी इच्छा वापस खंडवा में जाकर अपने आखरी दिन व्यतीत करने की थी। उनकी आखिरी फिल्म कौन जीता कौन हारा थी, जो 1987 में आई थी।


किशोर कुमार का निजी जीवन

Kishore Kumar Biography in Hindi में हम जानेंगे उनके निजी जीवन के बारे में। चलिए. जानते है उनकी पर्सनल लाइफ कैसी रही।
  1. उनकी पत्नी का नाम रुमा घोष था. किशोर कुमार ने उनसे 1951 में विवाह किया था, वो बंगाली फ़िल्मों की अभिनेत्री और गायिका भी थी। इन दोनों का एक बेटा है, जिनका नाम अमित कुमार है जो कि फ़िल्मों में अभिनेता, गायक, संगीत निर्देशक और फिल्म निर्देशक है। 1958 में किशोर और रुमा दोनों अलग हो गए थे।
  2. उन्होंने दूसरी शादी अभिनेत्री मधुबाला से 1960 में की थी मधुबाला के साथ उन्होंने चलती का नाम गाड़ी और झुमरू मे काम किया था दिल की बीमारी की वजह से मधुबाला निधन 23 फ़रवरी 1969 को हो गया था
  3. तीसरी शादी उन्होंने अभिनेत्री योगिता बालि के साथ वर्ष 1976 मे हुई थी। 1978 में यह शादी भी टूट गई।
  4. 1980 में किशोर कुमार ने चौथी शादी अभिनेत्री लीना चंदावरकर से की थी। इस विवाह से उन्हें एक पुत्र प्राप्त हुआ, जिनका नाम सुमित कुमार है।


किशोर कुमार के अनसुने किस्से

Kishore Kumar Biography in Hindi में हम जानेंगे किशोर कुमार के जीवन से जुड़े कुछ अनसुने किस्से, जो शायद ही आप सभी को पहले से पता हों। चलिए, जानते हैं।

1. एक बार की बात है। एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में जाने-माने निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी किशोर कुमार से मिलने उनके घर गए थे, लेकिन उनके वाचमैन ने उन्हें घर में घुसने से रोक दिया था और बेइज्जत करके भगा दिया था। ऐसा एक कंफ्यूजन के चलते हुआ था।


2. किशोर कुमार एकांत में समय बिताना पसंद करते थे और इंटरव्यू देने से नफरत करते थे। लोग उनसे मिलने कम आएं, इसलिए उन्होंने अपने घर के लिविंग रूम में खोपड़ी और हड्डियां लगवा ली थीं। साथ ही कमरे में रेड लाइट लगा रखी थी। ख़ास बात यह है कि खुद किशोर हॉरर फिल्में देखने से डरते थे।


3. एक बार किशोर दा निर्माता आर सी तलवार के साथ काम कर रहे थे, लेकिन आर सी तलवार ने उन्हें आधे पैसे दिए। किशोर दा तो अपने उसूल के पक्के थे, वे रोज सुबह तलवार लेकर निर्माता के घर के सामने पहुंच जाते थे और जोर-जोर से चिल्लाने लगते थे, "हे तलवार, दे दे मेरे आठ हजार... हे तलवार, दे दे मेरे आठ हजार...।"


4. जय जय शिव शंकर गाने में एक लाइन आती है ‘बजाओ रे बजाओ, भैया बजाओ, अरे पचास हजार लग गए’, यह लाइन किशोर दा ने मस्ती में गाई थी जिसका गाने से कोई मतलब नहीं था। प्रोडयूसर डायरेक्टर जे ओमप्रकाश बार बार कह रहे थे कि पचास हजार खर्च करा दिए, क्योंकि गाने का बजट बढ़ता जा रहा था।


5. किशोर दा जब कॉलेज में पढ़ते थे तब उन पर 10-20 पैसे की उधारी थी, जो उस समय बड़ी रकम होती थी। किशोर दा पर जब कैंटीन वाले के पांच रुपया बारह आना उधार हो गए और कैंटीन वाला उन्हें पैसे चुकाने को कहता तो वे वहीं बैठकर टेबल पर गिलास और चम्मच बजा बजाकर पांच रुपया बारह आना गा-गाकर कई धुनें निकालते थे और कैंटीन वाले की बात अनसुनी कर देते थे।


प्रस्तुति -देवांग मैत्रे

Atishi Takes Charge as Delhi’s Chief Minister: A Symbolic Leadership Transition

In a significant development for Delhi politics, Aam Aadmi Party (AAP) leader Atishi assumed the role of Chief Minister on September 22, 202...